यूपी के सरकारी अस्पतालों की बदहाल तस्वीर: मरीजों के बेड पर कुत्ते, दवाइयों पर चूहे—स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल

यूपी के सरकारी अस्पतालों की बदहाल तस्वीर: मरीजों के बेड पर कुत्ते, दवाइयों पर चूहे—स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल

यूपी के सरकारी अस्पतालों की बदहाल तस्वीर: मरीजों के बेड पर कुत्ते, दवाइयों पर चूहे—स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल

उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों से सामने आई तस्वीरें और वीडियो स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी हकीकत को उजागर कर रहे हैं। इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे मरीजों के बेड पर आवारा कुत्तों का घूमना और स्टोर रूम में रखी दवाइयों पर चूहों का कुतरना प्रशासनिक लापरवाही की पराकाष्ठा मानी जा रही है। इन घटनाओं ने मरीजों की सुरक्षा, स्वच्छता और इलाज की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

सूत्रों के अनुसार, कई जिलों के सरकारी अस्पतालों में सफाई व्यवस्था लंबे समय से उपेक्षित है। वार्डों में नियमित सैनिटाइजेशन नहीं होने, कचरा प्रबंधन में लापरवाही और सुरक्षा कर्मियों की कमी के चलते अस्पताल परिसर में आवारा जानवरों की आवाजाही बढ़ गई है। इससे मरीजों में संक्रमण फैलने का खतरा लगातार बना हुआ है।

दवाइयों और मेडिकल उपकरणों के भंडारण में भी भारी खामियां सामने आई हैं। स्टोर रूम में चूहों की मौजूदगी से दवाइयों के खराब होने की आशंका जताई जा रही है, जिससे मरीजों को घटिया या दूषित दवाएं मिलने का जोखिम बढ़ गया है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति सीधे तौर पर मरीजों की जान से खिलवाड़ है।

स्थानीय मरीजों और तीमारदारों ने अस्पताल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि शिकायतों के बावजूद न तो सफाई व्यवस्था सुधारी गई और न ही आवारा जानवरों पर कोई ठोस कार्रवाई हुई। कई बार मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है।

मामले के तूल पकड़ने के बाद स्वास्थ्य विभाग की ओर से जांच के आदेश दिए जाने की बात कही जा रही है। जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और व्यवस्था सुधार के आश्वासन तो दिए जा रहे हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह कदम जमीनी स्तर पर बदलाव ला पाएंगे या फिर यह मामला भी फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा।

फिलहाल, यूपी के सरकारी अस्पतालों की यह तस्वीर राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं पर गहरी चोट करती नजर आ रही है। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी और सख्त निगरानी नहीं की जाएगी, तब तक मरीजों को सुरक्षित और सम्मानजनक इलाज मिलना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।